अनुभाव/anubhaav

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अनुभाव  : पुं० [सं० अनु√भू (होना)+णिच्+धञ्] १. महिमा। बड़ाई। २. प्रभाव। ३. दृढ़ विश्वास। ४. दृढ़ निश्चय या संकल्प। ५. साहित्य में, वे विशिष्ट मानसिक और शारीरिक व्यापार जो मन में कोई भाव उत्पन्न होने, विशेषतः किसी रस की अनुभूति होने पर होते है। (एन्सुएन्ट) विशेष—साहित्यकारों ने नौं सात्त्विक अनुभाव (स्तंभ, स्वेद, स्वर-भंग, कंप, वैवर्ण्य, अश्रु, रोमांच, प्रलय और जुंभा) और बारह कायिक तथा मानसिक अनुभाव या हाव (लीला, विलास, विच्छित, विभ्रम, किलकिंचित्, ललित, मोट्टायित, विव्वोक, विह्रत, कुटृमित, हेला और बोधक) मानें हैं। ६. किसी व्यक्ति, वस्तु, वर्ग आदि में विशेष रूप से पाये जानेवाले गुण या लक्षण। (कैरेक्टरिस्टिक्स)
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अनुभावक  : वि० [सं० अनु√भू+णिच्+ण्युल्-अक] सोचने विचारने में प्रवृत्त करनेवाला।
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अनुभावन  : पुं० [सं० अनु√भू+णिच्+ल्युट्-अन] अंगभंगी द्वारा मन के भाव व्यक्त करना।
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अनुभावी (दिन्)  : वि० [सं० अनु√भू+णिनि] [संत्री० अनुभाविनी] १. जिसमें अनुभव करने की शक्ति या संवेदना हो। २. वह साक्षी जिसने सारी घटना स्वयं देखी हो। (आई विटनेस) ३. मृतक के वे संबंधी जिन्हें अशौच या सूतक लगता हो।
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अनुभाव्य  : वि० [सं० अनुभव से] जिसका अनुभव किया जा सकता हो या किया जाने को हो। अनुभव के योग्य। वि० [सं० अनु√भू+णिच्+यत्] १. प्रशंसा या बड़ाई के योग्य। २. (गुण या लक्षण) जो किसी में विशेष रूप से पाया जा सकता हो।
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