कब्ज/kabj

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कब्ज  : पुं० [अ०] १. पकड़कर अधिकार में करने की क्रिया या भाव। मुहा०—रूह कब्ज होना=होश गुम होना। रूह कब्ज करना=पकड़कर खींचना। ले जाना। २. पेट का वह विकार जिसके कारण पाखाना साफ नहीं होता। कोष्ठबद्धता। ३. मुसलमानी शासनकाल का एक सरकारी नियम, जिसके अनुसार कोई फौजी अफसर फौज के लिए किसी ज़मींदार से लगान वसूल करता था। ४. वह राजाज्ञा जिसके अनुसार फौजी अफसर को उक्त प्रकार से रुपया वसूल करने का अधिकार मिलता था।
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कब्जा  : पुं० [अ० कब्ज] १. किसी वस्तु पर होनेवाला ऐसा अधिकार जिसके अनुसार उस वस्तु का उपभोग किया जाता है। (पजेशन) जैसे—खेत या मकान पर होनेवाला कब्जा। २. औजार या हथियार का वह भाग जो हाथ या मुट्ठी में पकड़ा जाता है। मूठ। जैसे—कटार या तलवार का कब्जा। मुहा०—कब्जे पर हाथ डालना या रखना=कटार, तलवार आदि खींचने के लिए मूठ पर हाथ रखना। ३. लोहे पीतल आदि का बना हुआ एक प्रसिद्ध उपकरण जिससे चौखट के साथ पल्ले को कजा साजा है तथा जिसके कारण पल्ला घूमता है। कोंढा। ४. उक्त प्रकार का काम देनेवाला कोई उपकरण। ५. भुजदंड। मुश्क। ६. कुश्ती का एक पेच।
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कब्जादार  : पुं० [फा०] १. वह अधिकारी जिसका किसी चीज पर कब्जा हो। २. दखीलकार असामी। (अवध)। वि० (वस्तु) जिसमें कोई पल्ला खोलने और बंद करने के लिए कब्जा (कोढ़ा) लगा हो।
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कब्जियत  : स्त्री० [अ०] पेट में होनेवाला वह विकार जिसके कारण ठीक तरह से मल नहीं उतरता। कोष्ठबद्धता।
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कब्जुल वसूल  : पुं० [फा०] वह कागज जिस पर वसूल की हुई रकम लिखकर दी जाती है। भरपाई की रसीद।
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