कारण/kaaran

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कारण  : पुं० [सं०√कृ+णिच्+ल्युट-अन] १. कोई ऐसी घटना, परिस्थिति या बात जो कोई परिणाम,प्रभाव या फल उत्पन्न करे। वजह। सबब। (काँज) जैसे—(क) धूएँ का कारण आग है। (ख) गरमी के कारण पौधे सूख गये हैं। २. वह उद्देश्य तथ्य या बात जिसे ध्यान में रखकर अथवा जिसके विचार से कोई काम किया जाय। हेतु। जैसे—आप अपने वहाँ जाने का कारण बतलायें। ३. आदि। मूल। जैसे—ईश्वर या ब्रह्म की इस सृष्टि का कारण है। ४. साधन। ५. काम। कार्य। ६. किसी को कष्ट पहुँचाने के उद्देश्य से किया जानेवाला तांत्रिक उपचार। जैसे—लड़के पर किसी ने कुछ कारण कर दिया है ७. पूजन आदि के उपरांत किया जानेवाला मद्यपान। (तंत्र) ८. प्रयाण। ९. एक प्रकार का गीत। १॰. शिव। ११. विष्णु।
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कारण-माला  : स्त्री० [ष० त०] १. कारणों या हेतुओं की श्रंखला। २. साहित्य में एक अलंकार जिसमें पदार्थों का वर्णन कारण और कार्य की परम्परा के रूप में होता है। क्रमशः पहले का कथन बाद के कथन का कारण बनता जाता है अथवा उत्तरोत्तर के कथन पूर्व-पूर्व कथित पदार्थों के कारण होते हैं। जैसे—बिनु विश्वास भगति नहिं, तेहि बिनु द्रवहिं न राम। राम कृपा बिनु सपनेहुँ, जीवन लह विश्राम।—तुलसी।
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कारण-शरीर  : पुं० [कर्म० स०] वेदांत के अनुसार चित्त, अहंकार और जीवात्मा के योग से बना हुआ सूक्ष्म शरीर, जो स्थूल शरीर के अन्दर रहता है। यह इंद्रियों की विषय-वासना आदि से निर्लिप्त रहता या रहित होता है।
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कारणा  : स्त्री० [सं० कृ (हिंसा)+णिच्+युच्-अन+टाप्] १. कष्ट। पीड़ा। २. यम-यातना। ३. उत्तेजना।
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कारणिक  : पुं० [सं० कारण+ठक्-इक] १. वह जो किसी विषय की परीक्षा या विचार करता हो। २. विधिक क्षेत्र में प्रार्थना-पत्र आदि लिखनेवाला लिपिक। वि० १. कारण-संबंधी २. कारण के रूप में घटने या होनेवाला।
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कारणिकता  : स्त्री० [सं० कारणिक+तल्-टाप्] १. कारण या कारणिक होने की अवस्था या भाव। २. कार्य के साथ कारण का रहनेवाला संबंध। (कॉजैलिटी)
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कारणोपाधि  : पुं० [सं० कारण-उपाधि, ब० स०] ईश्वर। (वेदातं)।
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