क्षोभ/kshobh

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क्षोभ  : पुं० [सं०√क्षुभ् (चंचल होना)+घञ्] १. शान्ति, स्थिरता आदि में पड़नेवाली बाधा। जैसे—जल में होनेवाला क्षोभ। खलबली। २. कोई आपत्तिजनक बात या व्यवहार होने पर मन में होने वाली दुःखजन्य विकलता। ३. असंतोष। ४. भय। ५. कंप। कँपकँपी। उदा०—तेज बढ़े निज राज को, अरि उर उपजे छोभ।—केशव। ६. क्रोध।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
क्षोभक  : पुं० [स०] कामाख्या के पास का एक पर्वत।
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क्षोभकृत्  : पुं० [सं० क्षोभ√कृ (करना)+क्विप्] साठ संवत्सरों में से छत्तीसवाँ संवत्सर। (ज्योतिष)
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क्षोभण  : पुं० [सं०√क्षुभ्र+णिच्+ल्यु—अन्] १. वह जो क्षोभ उत्पन्न करे। २. कामदेव का एक बाग। ३. विष्णु। ४. शिव।
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क्षोभिणी  : स्त्री० [सं०√क्षुभ्+णिच्+णिनि—ङीप्] निषाद स्वर की अंतिम श्रुति। (संगीत)
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क्षोभित  : वि० [सं क्षोभ+इतच्] जिसे क्षोभ हुआ हो। क्षुब्ध।
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क्षोभी (भिन्)  : वि० [सं० क्षोभ+इनि] क्षुब्ध होनेवाला।
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