खरच/kharach

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खरच  : पुं० [अ० खर्च] १. धन, वस्तु, शक्ति आदि का होनेवाला उपभोग। जैसे–(क) शहर में रोज हजार मन नमक का खरच है। (ख) इस, काम में दो घंटे खरच हुए। २. धन की वह राशि, जो किसी वस्तु (या वस्तुओं) को क्रय करने में अथवा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यय की जाती है। व्यय। जैसे– (क) उनका महीने का खरच ५०० रु. है। (ख) इस पुस्तक पर १० रु. खरच पड़ा है। मुहावरा–खरच उठाना= विवश होकर व्यय का भार सहना। जैसे– उसका सारा खर्च हमें उठाना पड़ता है। खरच चलाना=आवश्यक व्यय के लिए धन देते रहना। जैसे– घर का सारा खरच वहीं चलाते हैं। (किसी को) खरच में डालना=किसी को ऐसी स्थिति में लाना कि उसे विवश होकर खरच करना पड़े। जैसे– तुमने हमें व्यर्थ के खरच में डाल दिया। (रकम का) खरच में पड़ना=व्यय की मदद में लिखा जाना। ३. किसी वस्तु को निर्मित अथवा प्रस्तुत करने में होनेवाला व्यय। लागत। जैसे– इस पुस्तक को प्रकाशित करने में १००० रु. खरच बैठेगा।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
खरचना  : स० [फा० खर्च] १. धन का खरच या व्यय करना। २. किसी वस्तु को उपयोग या काम में लाना। बरतना। (क्व.)
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खरचा  : पुं० [फा० खर्च] १. खाने, पहनने, खरचने आदि के लिए मिलने वाला धन या वृत्ति। २. दे० ‘खरच’।
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खरची  : स्त्री० [हिं० खरच] १. खरच या व्यय में लगनेवाला धन। २. वह धन जो दुश्चरित्रा स्त्रियों को कुकर्म कराने के बदले में (अपना खरच चलाने के लिए) मिलता है। मुहावरा– खरची कमाना=अपने निर्वाह या धनोपार्जन के लिए (स्त्रियों का) कुकर्म कराते फिरना। खरची पर चलना या फिरना=धन कमाने के लिए (स्त्रियों का) प्रसंग या संभोग करना।
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खरचीला  : वि० [हिं० खरच+ऊला (प्रत्य०)] जो आवश्यक से अधिक अथवा व्यर्थ के कामों में बहुत सा रूपया खरच करता हो। जी खोलकर या बहुत खरच करनेवाला।
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