गान/gaan

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गान  : पुं० [सं०√गै (गाना)+ल्युट्-अन] [वि० गेय, गातव्य] गाने की क्रिया या भाव। गाना। २. वह जो गाया जाए। गीत। ३. किसी प्रकार का बखान या वर्णन। जैसे–यशोगान। ४. शब्द। ५. जाना। गमन।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
गानगर  : पुं० [हिं० गान+फा० गर]=गायक।
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गानना  : स०=गाना। उदाहरण–नर अरू नारि राम गुन गानहिं।–तुलसी।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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गाना  : स० [सं० गानत्व] १. कविता, गीत आदि के चरणों का पदों का वह क्रमिक, मोहक और सरस उच्चारण जो सुर ताल वाले नियमों के अनुसार किसी विशिषट लय में होता है। २. पक्षियों आदि का मधुर स्वर में बोलना। कलरव करना। ३. विस्तारपूर्वक किसी विषय की चर्चा या वर्णन करना। (विशेषतः कविता या छंदों में)। मुहावरा–अपनी ही गाना=अपनी ही बात कहते चलना। (और दूसरे की ना सुनना)। ४. प्रशंसा या स्तुति करना।। ५. आराधना करना। भजना। उदाहरण–दिन द्वै लेहुँ गोविदहिं गाइ।–सूर। पुं० १. लय राग आदि में कविता पद्य आदि का उच्चारण करने की क्रिया या भाव। २. गाई जानेवाली चीज या रचना। गीत।
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गानी (निन्)  : वि० [सं० गान+इनि] १. गानेवाला। २. गमन करने या जानेवाला।
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