ढाल/dhaal

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ढाल  : स्त्री० [सं०√ढौक् (चलाना)+अच्, पृषो० सिद्धि] चमड़े, धातु आदि का बना हुआ वह गोलाकार उपकरण जिसे युद्ध-क्षेत्र में सैनिक लोग तलवार, भाले आदि का वार रोकने के लिए अपने बायँ हाथ में रखते थे। चर्म। फलक। मुहावरा–ढाल तलवार बाँधना=वीरों का सा वेश धारण करके योद्धा बनना। स्त्री० [सं० धार] किसी भूखंड का ऐसा तल जो क्षितिज के समतल न हो बल्कि तिरछा या नीचे की ओर झुका हुआ हो। स्त्री० [हिं० ढालना] १. ढालने की अवस्था, क्रिया या भाव। २. वह प्रकार या रूप जिसमें कोई चीज ढली या ढालकर बनी हो। ३. रंग-ढंग। तौर-तरीका। पद–चाल-ढाल (देखें)। ४. चन्दे, प्राप्य धन आदि की उगाही। (पश्चिम)।
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ढालना  : स० [सं० ध्वल्, प्रा० ढाल, डल्ल, गु० ढालवूँ, मरा० ढालणें, सि, ढारराड] १. कोई द्रव पदार्थ धार बाँधकर किसी पात्र में या यों ही कहीं गिराना या डालना। उँड़ेलना। जैसे–(क) गिलास में दूध ढालना। (ख) हंडे का पानी जमीन पर ढालना। २. कोई चीज बनाने के लिए गली या पिघली हुई धातु किसी साँचे में उँड़ेलना या गिराना। जैसे–पीतल के खिलौने या लोहे के कल-पुरजे ढालना। ३. पीने के लिए बोतल में से गिलास आदि में शराब उलटना या गिराना। ४. मद्य-पान करना। शराब पीना। जैसे–आज-कल मित्र मंडली में वह भी ढालने लगे हैं। ५. व्यंगंय हास्य आदि के रूप में कही हुई बात किसी दूसरे व्यक्ति पर लगाना या उसकी ओर प्रवृत्त करना। जैसे–साधारण हँसी की बात भी तुम मुझ पर ही ढीलने लगते हो ६. दाम लेकर कोई चीज बेचना। (दलाल) जैसे–वे अपने दोनों मकान ढाल रहे हैं। ७. प्राप्य धन, चन्दा आदि उगाहना। (पंजाब)।
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ढालवाँ  : वि०=ढालुआँ।
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ढालिया  : पुं० [हिं० ढालना] वह कारीगर जो साँचों में चीजें ढालकर बनाता हो। पुं० [हिं० ढाल] वह योद्धा जो अपने पास ढाल (रक्षा का उपकरण) रखता हो।
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ढाली (लिन्)  : पुं० [हिं० ढाल+इनि] वह सैनिक जो ढाल धारण किये हो।
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ढालुआँ  : वि० [हिं० ढाल] [स्त्री० ढालुई] १. (तल या स्तर) जो बराबर आगे की ओर नीचा होता गया हो। जिसमें ढाल अर्थात् आगे की ओर बराबर उतार हो। जैसे–जहाज का ढालवाँ किनारा। वि० [हिं० ढालना] (पदार्थ) जो साँचे आदि में ढालकर बनाया गया हो। जैसे–ढालवाँ लोटा।
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ढालू  : वि० [हिं० ढालना=बेचना] जो कोई चीज बेचने को हो। (दलाल) वि०=ढालआँ। (तल)।
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