पहेली/pahelee

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पहेली  : स्त्री० [सं० प्रहेलिका] १. प्रस्ताव के रूप में होनेवाली एक प्रकार की प्रश्नात्मक उक्ति या कथन जिसमें किसी चीज या बात के लक्षण बतलाते हुए अथवा घुमाव-फिराव से किसी प्रसिद्ध बात या वस्तु का स्वरूप मात्र बतलाते हुए यह कहा जाता है कि बतलाओ कि वह कौन सी बात या वस्तु है। (रिडल) क्रि० प्र०—बुझाना।—बूझना। विशेष—पहेलियाँ प्रायः दूसरों के ज्ञान या वृद्धि की परीक्षा के लिए होती हैं, और सभी जातियों तथा देशों में प्रचलित होती हैं। यह अर्थी और शब्दी दो प्रकार की होती हैं। यथा—‘फाट्यो पेट, दरिद्री नाम। उत्तम घर में बाको ठाम।’ शंख की आर्थी पहेली है, और ‘उस आधा आधा रफि होई। आधा-साधा समझै सोई।’ अशरफी की शाब्दी पहेली है। हमारे यहाँ वैदिक युग में पहले को ‘ब्रह्मोदय’ कहते थे; और अश्वमेध आदि यज्ञों में बलि कर्म से पहले ब्राह्मण तथा होता लोगों से ब्रह्मोदय के उत्तर पूछते अर्थात् पहेलियाँ बुझाते थे। भारत की कई (आदिम) जातियों में अब भी विवाह के समय पहेलियाँ बुझाने की प्रथा प्रचलित है। २. कोई ऐसी कठिन या गूढ़ बात अथवा समस्या जिसका अभिप्राय, आशय, तत्त्व या निराकरण सहज में न होता हो और जिसे सुनकर लोगों की बुद्धि चकरा जाती हो। दुर्ज्ञेय और विकट प्रश्न या बात। (रिडल, उक्त दोनों अर्थों में) ३. अधिक विस्तार में घुमा-फिराकर तथा अस्पष्ट रूप में कही हुई कोई बात। मुहा०—पहेली बुझाना=बहुत घुमाव-फिराव से ऐसी बात कहना जो लोगों को चक्कर में डाल दे। जैसे—अब पहेलियाँ बुझाना छोड़ो, और साफ-साफ बतलाओ कि तुम क्या चाहते हो (या वहाँ क्या हुआ)।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
पहेली  : स्त्री० [सं० प्रहेलिका] १. प्रस्ताव के रूप में होनेवाली एक प्रकार की प्रश्नात्मक उक्ति या कथन जिसमें किसी चीज या बात के लक्षण बतलाते हुए अथवा घुमाव-फिराव से किसी प्रसिद्ध बात या वस्तु का स्वरूप मात्र बतलाते हुए यह कहा जाता है कि बतलाओ कि वह कौन सी बात या वस्तु है। (रिडल) क्रि० प्र०—बुझाना।—बूझना। विशेष—पहेलियाँ प्रायः दूसरों के ज्ञान या वृद्धि की परीक्षा के लिए होती हैं, और सभी जातियों तथा देशों में प्रचलित होती हैं। यह अर्थी और शब्दी दो प्रकार की होती हैं। यथा—‘फाट्यो पेट, दरिद्री नाम। उत्तम घर में बाको ठाम।’ शंख की आर्थी पहेली है, और ‘उस आधा आधा रफि होई। आधा-साधा समझै सोई।’ अशरफी की शाब्दी पहेली है। हमारे यहाँ वैदिक युग में पहले को ‘ब्रह्मोदय’ कहते थे; और अश्वमेध आदि यज्ञों में बलि कर्म से पहले ब्राह्मण तथा होता लोगों से ब्रह्मोदय के उत्तर पूछते अर्थात् पहेलियाँ बुझाते थे। भारत की कई (आदिम) जातियों में अब भी विवाह के समय पहेलियाँ बुझाने की प्रथा प्रचलित है। २. कोई ऐसी कठिन या गूढ़ बात अथवा समस्या जिसका अभिप्राय, आशय, तत्त्व या निराकरण सहज में न होता हो और जिसे सुनकर लोगों की बुद्धि चकरा जाती हो। दुर्ज्ञेय और विकट प्रश्न या बात। (रिडल, उक्त दोनों अर्थों में) ३. अधिक विस्तार में घुमा-फिराकर तथा अस्पष्ट रूप में कही हुई कोई बात। मुहा०—पहेली बुझाना=बहुत घुमाव-फिराव से ऐसी बात कहना जो लोगों को चक्कर में डाल दे। जैसे—अब पहेलियाँ बुझाना छोड़ो, और साफ-साफ बतलाओ कि तुम क्या चाहते हो (या वहाँ क्या हुआ)।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
 
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