पोल/pol

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पोल  : स्त्री० [हिं० पोला] १. पोले होने की अवस्था या भाव। पोलापन। २. किसी चीज के अंदर का पोला स्थान। खाली जगह। अवकाश। जैसे—ढोल के अंदर पोल। ३. अंदर का आवश्यक भराव न होने या न रह जाने के फल-स्वरूप होनेवाली शून्यता। ३. लाक्षणिक अर्थ में, ऐसी स्थिति जो ऊपर से देखने में तो आडंबरपूर्ण हो, परंतु जिसमें सार या तत्त्व कुछ भी न हो। मुहा०—(किसी की) पोल खुलना=भीतरी दुरवस्था, सारहीनता आदि प्रकट हो जाना। छिपा हुआ दोष या बुराई प्रकट हो जाना। भंडा फूटना। (किसी की) पोल खोलना=ऐसा कार्य करना जिससे किसी के अंदर की दुरवस्था, दोष, सारहीनता आदि बातें सब पर प्रकट हो जायँ। पुं० [सं० प्रतोली; प्रा० पओली] १. नगर का मुख्य प्रवेश द्वार। उदा०—अबिनासी की पोल पर जी, मीराँ करै छै पुकार।—मीराँ। २. बड़ा दरवाजा। फाटक। ३. घर का आँगन। सहन। पुं० [सं०√पुल् (उठना, महत्व का होना)+ण] एक प्रकार का फुलका। पोली।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
पोलक  : पुं० [हिं० पूला] लंबे बाँस के छोर पर चरखी में बँधा हुआ पयाल जिसे लुक की तरह जलाकर मस्त हाथी को डराते और वश में करते हैं।
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पोलच (ा)  : पुं० [हिं० पोल] १. वह परती भूमि जो पिछले वर्ष रबी बोने के पहले जोती गई हो। जौनाल। २. ऐसा ऊसर जो बहुत दिनों से जोता-बोया न गया हो।
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पोला  : वि० [हिं० फूलना, या सं० पोल=फुलका] [स्त्री० पोली] १. जिसके अंदर कुछ न हो, खाली जगह या हवा ही हो। अंदर से खाली। खोखला। ‘ठोस’ का विपर्याय। जैसे-पोला छड़, पोली नली। २. जिसके नीचे का तल कड़ा या ठोस न हो। जिसके अंदर उचित या पूरा भराव न हो। जो कड़ा या ठोस न हो। जैसे—पोली जमीन। ३. जिसमें विशेष तत्त्व या सार न हो। निस्सार और इसी लिए प्रायः निरर्थक या रद्दी। थोथा। पुं० [देश०] एक प्रकार का छोटा पेड़ जिसकी छाल से रस्सी बनाई जाती है। इसकी लकड़ी साफ और नरम होती है। पुं०=पूला।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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पोलाद  : पुं०=फौलाद।
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पोलारी  : स्त्री० [हिं० पोल] छेनी के आकार का एक छोटा औजार जिससे सुनार, कंगन, घुँघरु आदि के दाने बनाते हैं।
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पोलाव  : पुं०=पुलाव।
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पोलिया  : स्त्री० [हिं० पोला] पैरों में पहनने का एक प्रकार का पोला गहना। पुं०=पौरिया।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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पोली  : स्त्री० [सं०√पुल्+ण+ङीष्] एक प्रकार की पूरी। स्त्री० [देश०] जंगली कुसुम या बर्रे जिसका तेल मोमजामा बनाने के काम में आता है।
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पोलीड़ा  : पुं० [हिं० पोल=फाटक] फाटक पर पहरा देनेवाला दरबान। (राज०)
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पोलो  : पुं० [अं०] घोड़ों पर चढ़कर खेला जानेवाला गेंद का खेल। चौगान।
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