माँड़/maand

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माँड़  : पुं० [सं० मण्ड] उबाले या पकाये हुए चावलो में से बाकी बचा हुआ पानी जो गिरा या निकाल दिया जाता है। पसाव। पीच। स्त्री० [हिं० माँड़ना] १. माँड़ने की क्रिया या भाव। २. एक प्रकार का राग जिसका प्रचलन राजस्थान में अधिक है। ३. एक प्रकार की रोटी। उदाहरण—झालर माँड़ आए घिउ पोए।—जायसी।
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
माँड़ना  : स० [सं० मंडन] १. मर्दन करना। मसलना। २. गूँधना। सानना। जैसे—आटा माँड़ना। ३. लेप करना। पोतना। ४. सजाना या सँवारना। ५. अन्न की बालों में से दाने झाड़ना। ६. ठानना। किसी प्रकार की क्रिया संपन्न करना अथवा उसका आरम्भ करना। जैसे—खाते या बही में कोई रकम माँड़ना, अर्थात् चढ़ाना या लिखना। मुहावरा—पग माँड़ना=पैर रोकना। ठहरना। रुकना। उदाहरण—आयी हूँ पग माँड़ि अहीर।—प्रिथीराज। बाद माँड़ना= (क) हठ करना। (ख) विवाद या बहस करना। उदाहरण—जाणे वाद माँड़ियों जीपण।—प्रिथीराज। ७. दे० ‘मलाना’।
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माँड़नी  : स्त्री० [सं० मंडन, हिं० माँड़ना] १. माँडऩे की क्रिया या भाव। २. किनारा। हाशिया। ३. मगजी। गोट। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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माँड़व  : पुं० =मंडप। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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माँड़ा  : पुं० [स० मंड] १. आँख में झिल्ली पड़ने का एक रोग० २. इस प्रकार आँख में पड़नेवाली झिल्ली। पुं० [हिं० माँड़ना=गूँधना] १. एक प्रकार की बहुत पतली पूरी जो मैदे की होती है और घी में पकती हैं। लुच्ची। २. पराठा या पराठा नामक पकवान। ३. उलटा या चीला नामक पकवान। पुं० =मँड़वा (मंडप)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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माँड़ी  : स्त्री० [सं० मंड] १. भात का पसाव या माँड़ जो प्राय कपड़े या सूत पर कलफ करने के लिए लगाते हैं। २. उक्त काम के लिए बनाया जानेवाला जुलाहों का एक प्रकार का घोल या मिश्रण। क्रि० प्र०—चढ़ाना।—देना।—लगाना।
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