माँह/maanh

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माह  : अव्य० [मध्य; प्रा० मज्झ] में। पुं० [सं० माष० प्रा० माह] उड़द। पुं० =मास (महीना)। पुं० =माघ नामक महीना। (यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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माहत  : स्त्री० [सं० महत्ता] महत्त्व। बड़ाई।
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माहताब  : पुं० [फा०] १. चंद्रमा। २. चाँदनी। स्त्री० =माहताबी।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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माहताबी  : स्त्री० [फा०] १. एक तरह की आतिशबाजी। २. चाँदनी रात का मजा लेने के लिए बैठने के लिए बनाया हुआ चबूतरा। ३. तरबूज। ४. चकोतरा। ५. एक तरह का कपड़ा। वि० माहताब अर्थात् चन्द्रमा की चाँदती में बनाया या तैयार किया हुआ। जैसे—माहताबी गुलकन्द।
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माहना  : अ० =उमाहना (उमड़ना)।(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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माहर  : पुं० [सं माहिर =इन्द्र] इन्द्रयान। पद—माहर का फल =ऐसा पदार्थ जो देखने में तो सुन्दर हो, पर दुर्गुणों से भरा हो। वि० =माहिर (जानकार)। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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माहरा  : सर्ब० =हमारा। (राज०) (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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माहली  : पुं० [हिं० महल] १. महल अर्थात् अन्तःपुर में काम करनेवाला सेवक। २. महली। खोजा। ३. नौकर। सेवक।
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माहव  : पुं० =माधव। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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माहवार  : अव्य० [फा०] प्रतिमास। हर महीने। पुं० हर महीने मिलनेवाला वेतन। मासिक वेतन। वि० हर महीने होनेवाला। मासिक।
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माहवारी  : वि० [फा०] मासिक। स्त्री० स्त्रियों का मासिक-धर्म।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
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माहाँ  : अव्य = महँ (बीच)।
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माहाकुल  : वि० [सं० महाकुल +अञ्] ऊँचे घराने में उत्पन्न। महाकुल।
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माहाकुलीन  : वि० [सं० महाकुल+खञ्—ईन] बहुत बड़ा कुलीन।
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माहाजनीन  : वि० [सं० महाजन+खञ्+ईन, वृद्धि] १. जो महाजनों के लिए उपयुक्त हो। २. महाजनों की तरह का।
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माहात्मिक  : वि० [सं० महात्मन्+ठक्—इक] १. महात्मा-सम्बन्धी। महात्मा का। २. जिसकी विशेष महत्ता हो। महात्मा से युक्त।
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माहात्म्य  : पुं० [सं० महात्मन्+ष्यञ्] १. महत् होने की अवस्था या भाव। गौरव। महिमा। २. आदर-सम्मान। ३. धार्मिक क्षेत्र में किसी पवित्र या पुण्य-कार्य से अथवा किसी स्थान के महत्त्व का वर्णन। जैसे—एकादशी माहात्म्य काशी माहात्म्य।
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माहाना  : वि० [फं०] माहवार। मासिक।
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माहिं  : अव्य० [सं० मध्य; प्रात० मज्झ] अन्दर। भीतर में। (अधिकरण कारक का चिन्ह)
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माहित  : पुं० [सं० महित+अण्] महित ऋषि के गोत्र में उत्पन्न व्यक्ति।
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माहित्य  : पुं० [सं० महित+यञ्] महित ऋषि के गोत्र में उत्पन्न व्यक्ति।
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माहियत  : स्त्री [अ० माहीयात] १. भीतरी और वास्तविक तत्व । २. प्रकृति। ३. विवरण।
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माहिया  : पुं० [पं०] १. प्रियम। प्रिय। २. एक प्रकार का प्रसिद्ध पंजाबी गेयपद दो तीन चरणों का होता है और जिसमें मुख्यतः करुण और श्रृंगार रस की प्रधानता होती है और बिहर-दशा का मार्मिक वर्णन होता है।
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माहियाना  : वि० [फा० माहियान
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माहिर  : पुं० [सं० √मह+इरन् बा०] इन्द्र। वि० [अ०] किसी बात या विषय का पूर्ण ज्ञाता। अच्छा जानकार।
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माहिला  : पुं० [सं० मध्य] अन्तर। फरर्क। वि० [स्त्री० माहिली] १. मध्य या बीच का। मँझला। २. अन्दर का। आन्तरिक। पुं० =माँझी। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)(यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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माहिले  : अव्य० [हिं० माहि] अन्दर। भीतर। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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माहिष  : वि० [सं० महिषी+अण्] भैंस सम्बन्धी या भैंस का (दूध आदि)।
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माहिष-वल्लरी  : स्त्री० [सं० उपमि० स०] काला विधारा। कृष्ण वृद्धदारक।
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माहिष-वल्ली  : स्त्री० [सं० उपमि० स०] छिरहटी।
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माहिषिक  : पुं० [सं० महिषी +ठक्-इक, वृद्धि] १. व्यभिचारिणी स्त्री का पति। २. भैंस के द्वारा जीविका निर्वाह करनेवाला व्यक्ति।
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माहिष्मती  : स्त्री० [सं०] वर्तमान मध्य प्रदेश में स्थित एक बहुत पुरानी नगरी जिसे मांधाता के पुत्र मुचकुंद ने बसाया था।
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माहिष्य  : पुं० [सं० महिषी+ष्यञ्, वृद्धि] स्मृतियों के अनुसार एक संकर जाति।
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माहीं  : अव्य०=माँहि।
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माही  : स्त्री [सं० माहेय] एक नदी जो खंभात की खाड़ी में गिरती है। स्त्री० [फा०] मछली। पद—माही-गौर, माही-पुश्त, माही-मरातिब।
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माही-गीर  : पुं० [फा०] मछली पकड़नेवाला। मछुवा।
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माही-पुश्त  : वि० [फा०] जो मछली की पीठ की तरह उभरा हुआ और किनारे-किनारे ढालुआँ हो। पुं० एक प्रकार का कारचोबी का काम जो बीच में उभरा हुआ और दोनों ओर से ढालुआँ होता है।
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माही-मरातिब  : पं० [फा०] मुगल बादशाहों के आगे हाथी पर चलने-वाले सात झंड़े जिन पर अलग-अलग मछली, सातों ग्रहों आदि की आकृतियाँ कारचोबी की बनी होती थीं।
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माहुति  : स्त्री० [सं० माध-घटा] माघ महीने की घटा या बादल। (यह शब्द केवल स्थानिक रूप में प्रयुक्त हुआ है)
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माहुर  : पुं० [सं० मधुर, प्रा० महुर =विष] विष। पद—माहुर की गाँठ=(क) बहुत ही जहरीली और खराब चीज। (ख) बहुत ही दुष्ट हृदय का व्यक्ति।
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माहुरी  : स्त्री० [सं० माधुरी] संगीत में कर्नाटकी पद्धति की एक रागिनी।
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माहूँ  : स्त्री० [देश०] १. एक प्रकार का छोटा कीड़ा जो राई, सरसों, मूली आदि की फसल में उनके डंठलों पर फूलने के समय या उसके पहले अंडे दे देता है। २. कनसलाई नाम का कीड़ा।
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माहेंद्र  : वि० [सं० महेन्द्र+अण्] १. महेन्द्र-संबंधी। महेन्द्र का। २. जिसका देवता महेन्द्र हो। ज्योतिष में, वार के अनुसार भिन्न-भिन्न दंड़ों में पड़नेवाला एक योग जिसमें यात्रा करने का विधान है। ३. एक प्रकार का प्राचीन अस्त्र। ४. सुश्रुत के अनुसार एक देवग्रह जिसके आक्रमण करने के ग्रहग्रस्त पुरुष में माहात्म्य, शौर्य, शास्त्र-बुद्धिता आदि गुए एकाएक आ जाते हैं। ५. जैनियों के एक देवता दो कल्पभव नामक वैमानिक देवगण में है। ६. जैनियों के एक देवता जो कल्पभव नामक वैमानिक देवगण में है। जैनियों के अनुसार चौथे स्वर्ग का नाम।
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माहेंद्री  : स्त्री० [सं० महेन्द्र+ङीष्] १. महेन्द्र अर्थात् इन्द्र की शक्ति। २. इन्द्र की पत्नी। ३. इन्द्रासन। ४. गाय। गौ। ५. सात मातृकाओं में से एक।
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माहेय  : वि० [सं० मही +ढक० ढ—एय] मिट्टी का बना हुआ। पुं० १. मूँगा नामक रत्न। विद्रुम। २. मंगल ग्रह। ३. नरकासुर।
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माहेयी  : स्त्री० [सं० माहेय+ङीष्] १. गाय। गौ। २. माही नाम की नदी।
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माहेल  : पुं० [सं० महेल+अण्] एक गोत्र-प्रवर्तक ऋषि।
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माहेश  : वि, [सं० महेशा+अण्] महेश का।
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माहेशी  : स्त्री० [सं० माहेश+ङीष्] दुर्गा।
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माहेश्वर  : वि० [सं० महेश्वर+अण् वृद्धि] महेश्वर-सम्बंधी। महेश्वर का। पुं० १. एक प्रसिद्ध शैव सम्प्रदाय। २. एक प्रकार का यज्ञ। ३. एक उप-पुराण का नाम। ४. एक प्रकार का प्राचीन अस्त्र। ५. पाणिनि के वे चौदह सूत्र जिन्हें प्रत्याहार कहते हैं और जिन्हें पाणिनि ने अष्टाध्यायी के सूत्रों का प्रमुख आधार बनाया है।
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माहेश्वरी  : जी० [सं० माहेश्वरी+ङीष्] १. दुर्गा। २. एक मातृका का नाम। ३. एक प्राचीन नदी। ४. एक प्रसिद्ध पीठ या तीर्थ-स्थान। पुं० वैश्यों की एक जाति।
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माहों  : पुं० =माहूँ (कीड़ा)।
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