सँवार/sanvaar

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सँवार  : स्त्री० [हिं० सँवरना] १. सँवरने या सँवारने की क्रिया, भाव या स्थिति। २. सँवारा या सँवारा हुआ रूप। ३.संशोधन। उदा-केर सणवार गोसाई जहाँ परै कछु चूक।—जायसी। ४.‘मार’ के स्थान पर मंगल भाषित बोला जाने वाला शब्द। (मुसलमान स्त्रियाँ) जैसे-तुझ पर खुदा की सँवार (अर्थात मार)।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है) पुं० [सं० संवाद, स्मरण] हाल। समाचार। उदा०—पुनि रे सँवार कहेसि अरु दूजी।—जायसी।(यह शब्द केवल पद्य में प्रयुक्त हुआ है)
समानार्थी शब्द-  उपलब्ध नहीं
सँवार  : पुं० [सम√वृ (ढ़कना)+घञ्] १. आवरण डालकर कोई चीज छिपाना या ढकना। २. शब्दों के उच्चारण के समयकंठ के भीतरी भाग का कुछ दबना या सिकुड़ना। ३. उच्चारण के वाह्य प्रयत्नों में से एक जिसमें कंठ का आंकुचन होता है। ‘विवार’ का उल्टा। ४. बाधा। अड़चन।
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संवारण  : पुं० [सम्√वृ (वारण करना)+णिच्-ल्युट्-अन] [भू० कृ० संवादित, वि० संवार्य] १. दूर करना। निवारण करना। हटाना। २. न आने देना। रोकना। ३. निषेध करना। मनाही। ४. छिपाना। ढकना।
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संवारणीय  : वि० [सम्√वृ (दूर करना)+णिच्-अनीयर्] जिसका संवारण हो सके या होने को हो।
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सँवारना  : स० [सं० संवर्णन] १. किसी चीज को ऐसा रूप देना कि वह अच्छा और सुन्दर जान पड़े। २. ठीक और दुरुस्त करके काम में आने के योग्य बनाना। ३. अलंकृत करना। सजाना। ४. क्रम से लगाकर या ठीक करके रखना। ५. सुचारु रूप से कोई कार्य सम्पन्न करना। जैसे—ईश्वर ही हमारे सब कार्य सँवारता है।
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संवारित  : भू० कृ० [सम्√वृ (हटाना)+णिच्-क्त] जिसका संवारण किया गया हो या हुआ हो।
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संवार्य  : वि० सम्√वृ (मना करना)+णिच्-णयत्]=संवारणीय।
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